पेंड्री-स से बदरा-ब तक 10 किलोमीटर सड़क की हालत खराब, किनारे उखड़े और जगह-जगह गड्ढे; हाईवा निकालने दो हाइड्रा व एक लोडर की लेनी पड़ी मदद, 24 घंटे बाद निकला वाहन
तीन कोल डिपो और पांच राइस-पोहा मिलों से भारी वाहनों की आवाजाही पर उठे सवाल, ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर की शिकायत; जांच और कार्रवाई की मांग
सरगांव। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क की हालत महज दो महीने में खराब होने लगी है। रायपुर-बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से ग्राम पेंड्री-स होते हुए बदरा-ब तक करीब 10 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण 5 करोड़ 4 लाख 86 हजार रुपये की लागत से कराया गया है। लेकिन निर्माण के लगभग दो महीने बाद ही सड़क के किनारे धंसने, मिट्टी का कटाव होने और जगह-जगह गड्ढे उभरने की स्थिति सामने आने लगी है। 14 सितंबर को इसी मार्ग पर कोयला लोड एक हाईवा सड़क के किनारे धंस गया। वाहन को निकालने के लिए दो हाइड्रा और एक लोडर की मदद लेनी पड़ी। करीब 24 घंटे की मशक्कत के बाद वाहन को बाहर निकाला जा सका। इस घटना ने सड़क की गुणवत्ता, निर्माण कार्य की तकनीकी जांच, भारी वाहनों के भार और संबंधित विभागों की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस सड़क का निर्माण ग्रामीणों को बेहतर आवागमन की सुविधा देने के लिए किया गया था, उसी सड़क पर अब भारी वाहनों की आवाजाही परेशानी का कारण बनती जा रही है। सड़क के किनारे धंसने, मिट्टी कटने और गड्ढे बनने से ग्रामीणों को आवागमन में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कोयला लोड हाईवा के धंसने की घटना ने सड़क की मजबूती को लेकर ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क आखिर इतनी जल्दी खराब क्यों होने लगी? क्या निर्माण के दौरान निर्धारित मानकों का पालन किया गया था, या फिर सड़क पर उसकी क्षमता से अधिक भार वाले वाहनों की लगातार आवाजाही इसकी दुर्दशा का कारण बन रही है? इन सवालों का जवाब तकनीकी जांच और संबंधित विभागों के अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकेगा।

14 सितंबर को धंसा कोयला लोड हाईवा, 24 घंटे तक चला वाहन निकालने का प्रयास
इस मार्ग पर 14 सितंबर को दोपहर करीब 12 बजे कोयला लोड एक हाईवा सड़क के किनारे धंस गया। चालक के अनुसार, वह पेंड्री मार्ग स्थित कोल डिपो से कोयला लेकर तिल्दा गया था। वहां जांच के दौरान कोयला रिजेक्ट होने के बाद वह वाहन लेकर वापस डिपो लौट रहा था। इसी दौरान सड़क के किनारे हाईवा धंस गया और वाहन फंस गया।
हाईवा को निकालने के लिए दो हाइड्रा और एक लोडर को मौके पर लगाना पड़ा। इसके बावजूद वाहन को तत्काल बाहर निकालने में सफलता नहीं मिली। काफी मशक्कत के बाद करीब 24 घंटे में वाहन को बाहर निकाला जा सका। इस घटना के बाद सड़क की मजबूती और किनारों की स्थिति पर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सड़क के किनारे इस तरह भारी वाहन धंस रहे हैं, तो यह सड़क की स्थिति और उस पर हो रहे भार की जांच का विषय है।
हालांकि, केवल इस घटना के आधार पर सड़क निर्माण में तकनीकी खामी या निर्धारित मानकों के उल्लंघन की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए निर्माण कार्य की गुणवत्ता, सड़क की संरचना, मिट्टी की स्थिति, जल निकासी व्यवस्था और संबंधित तकनीकी पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
5.04 करोड़ की लागत, फिर भी निर्माण के दो माह में सड़क के किनारे उखड़ने लगे
पेंड्री-स से बदरा-ब तक करीब 10 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 5 करोड़ 4 लाख 86 हजार रुपये की लागत से कराया गया है। सड़क निर्माण का उद्देश्य ग्रामीणों को बेहतर और सुगम आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराना है। लेकिन निर्माण के लगभग दो महीने बाद ही सड़क के कई हिस्सों में किनारों के धंसने, मिट्टी कटने और गड्ढे बनने की शिकायतें सामने आने लगी हैं।
मौके की तस्वीरों में सड़क के किनारे मिट्टी का कटाव, गहरी खुदाई, गड्ढे और कई स्थानों पर कमजोर दिखाई देने वाले किनारे नजर आ रहे हैं। सड़क की वर्तमान स्थिति को देखकर निर्माण कार्य की गुणवत्ता और सड़क की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सड़क निर्माण के दौरान बेस की मजबूती, निर्धारित मोटाई, निर्माण सामग्री और कम्पैक्शन यानी मिट्टी तथा अन्य निर्माण सामग्री को उचित तरीके से दबाकर मजबूत करने की प्रक्रिया की जांच किस स्तर पर हुई थी? क्या सड़क निर्माण की प्रत्येक परत की गुणवत्ता की जांच की गई थी? क्या निर्माण सामग्री के नमूने लेकर उनका प्रयोगशाला में परीक्षण कराया गया था? क्या सड़क के किनारों की मजबूती और जल निकासी व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था? निर्माण कार्य पूरा होने के बाद संबंधित अधिकारियों ने किस आधार पर कार्य को स्वीकार किया?
इन सभी सवालों का जवाब संबंधित विभाग के तकनीकी रिकॉर्ड, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, निर्माण संबंधी दस्तावेजों और स्थल निरीक्षण से ही मिल सकता है। ऐसे में सड़क की तकनीकी जांच कराकर वास्तविक स्थिति सामने लाने की मांग उठ रही है।

तीन कोल डिपो संचालित, केवल एक के बाहर लगा है जानकारी का बोर्ड
स्थानीय लोगों के अनुसार, पेंड्री मार्ग पर तीन कोल डिपो संचालित हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन तीन कोल डिपो में से केवल एक डिपो के बाहर श्याम ट्रेडिंग के नाम से बोर्ड लगा हुआ है, जिस पर जानकारी प्रदर्शित की गई है। वहीं, अन्य दो कोल डिपो के बाहर स्पष्ट जानकारी देने वाला बोर्ड दिखाई नहीं देता।
इस स्थिति को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभागों द्वारा मार्ग पर संचालित सभी कोल डिपो की पहचान, उनके संचालन से संबंधित दस्तावेजों और आवश्यक अनुमतियों की जांच की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि इन डिपो से प्रतिदिन कितने भारी वाहन निकलते हैं और उनके परिवहन की व्यवस्था किस प्रकार संचालित हो रही है।
कोयला डिपो के संचालन और उससे जुड़े भारी वाहनों की आवाजाही के बीच सड़क की स्थिति लगातार खराब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में डिपो के संचालन, वाहनों के भार और सड़क पर पड़ने वाले प्रभाव की समग्र जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
तीन कोल डिपो के साथ पांच राइस और पोहा मिलों से भी गुजरते हैं भारी वाहन
इस मार्ग पर केवल कोयला डिपो ही नहीं, बल्कि करीब पांच राइस एवं पोहा मिलें भी संचालित होने की जानकारी स्थानीय लोगों ने दी है। इन इकाइयों से जुड़े भारी वाहनों की आवाजाही भी इसी सड़क से होती है। ग्रामीणों का कहना है कि दिनभर भारी वाहनों के गुजरने से सड़क पर लगातार दबाव पड़ता है।
ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि सड़क का निर्माण किस निर्धारित भार और यातायात को ध्यान में रखकर किया गया था तथा वर्तमान में इस मार्ग से गुजरने वाले वाहनों का वास्तविक भार कितना है। यदि सड़क की निर्धारित क्षमता से अधिक भार वाले वाहन संचालित हो रहे हैं, तो उनकी जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
स्थानीय लोगों ने परिवहन विभाग से इस मार्ग पर वाहनों के वजन की जांच कराने और ओवरलोडिंग के विरुद्ध कार्रवाई करने की मांग की है। साथ ही संबंधित अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने की अपील की है कि सड़क की क्षमता के अनुरूप ही वाहनों का आवागमन हो, ताकि सड़क को समय से पहले क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सके।

पहले भी उठ चुका है ओवरलोड कोयला वाहनों का मुद्दा, ग्रामीणों की बढ़ती परेशानी
पेंड्री-स गांव के मार्ग पर कोयला डिपो खुलने के बाद से भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर ग्रामीणों की परेशानी लगातार सामने आती रही है। ग्रामीणों के अनुसार, इस मार्ग पर करीब 15 टन की क्षमता वाली सड़क पर कथित तौर पर 40 से 50 टन तक कोयला लदे वाहन चलाए जा रहे हैं। निर्धारित क्षमता और वास्तविक वाहन भार के बीच अंतर होने की आशंका को लेकर ग्रामीणों ने चिंता जताई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि भारी वाहनों की लगातार आवाजाही से सड़क की स्थिति बिगड़ रही है। आए दिन कोई न कोई ट्रक या भारी वाहन सड़क पर फंस जाता है, जिससे आवागमन बाधित हो जाता है। सड़क की चौड़ाई कम होने के कारण एक ट्रेलर या हाईवा फंस जाने पर छोटे वाहनों, विशेषकर बाइक चालकों को निकलने में परेशानी होती है।
रात के समय स्थिति और गंभीर हो जाती है। ग्रामीणों के मुताबिक, कई बार सड़क पर जाम लगने से आवागमन पूरी तरह प्रभावित हो जाता है। सड़क की कम चौड़ाई और भारी वाहनों की आवाजाही के कारण दोपहिया वाहन चालकों तथा छोटे वाहनों को रास्ता निकालने में काफी दिक्कत होती है।
ग्रामीणों की मांग है कि सड़क पर भारी वाहनों के संचालन को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। वाहनों के भार की जांच की जाए और यदि ओवरलोडिंग या अन्य नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित वाहन संचालकों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर चार ग्रामीणों ने की शिकायत
सड़क की खराब स्थिति और भारी वाहनों की आवाजाही से परेशान क्षेत्र के चार ग्रामीण मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करा चुके हैं। ग्रामीणों के अनुसार, शिकायत में सड़क की स्थिति, किनारों के धंसने, गड्ढों और आवागमन में हो रही परेशानियों की जानकारी दी गई है। इसके बावजूद अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत दर्ज कराने का उद्देश्य संबंधित अधिकारियों का ध्यान समस्या की ओर आकर्षित करना और सड़क को सुरक्षित रखना है। लेकिन सड़क की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने से लोगों की चिंता बनी हुई है।
ग्रामीण चाहते हैं कि शिकायतों को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखा जाए, बल्कि मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किया जाए। सड़क निर्माण की गुणवत्ता, भारी वाहनों के भार और कोल डिपो से जुड़े परिवहन की व्यवस्था की जांच कराकर जिम्मेदारी तय की जाए।
सड़क खराब होने से ग्रामीणों के रोजमर्रा के जीवन पर असर
सड़क की खराब स्थिति का सीधा असर आसपास के गांवों के लोगों के आवागमन पर पड़ रहा है। सड़क के किनारे धंसने और जगह-जगह गड्ढे होने से दोपहिया वाहन चालकों के साथ पैदल चलने वालों को भी परेशानी हो रही है। बारिश के दौरान मिट्टी के कटाव और सड़क के किनारों के कमजोर होने से स्थिति और खराब होने की आशंका रहती है।
इस मार्ग से स्कूली बच्चे, ग्रामीण, किसान और मरीज आवागमन करते हैं। सड़क पर भारी वाहनों की लगातार आवाजाही और जाम की स्थिति के कारण लोगों को समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है। वहीं, संकरी सड़क पर भारी वाहन फंसने से दुर्घटना का खतरा भी बना रहता है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क का निर्माण जनसुविधा के लिए किया गया था, लेकिन यदि निर्माण के कुछ ही समय बाद सड़क खराब होने लगे और भारी वाहनों की आवाजाही से ग्रामीणों का रास्ता बाधित हो, तो इस समस्या का समाधान प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों की मांग—सड़क की तकनीकी जांच हो, ओवरलोडिंग पर लगे रोक
क्षेत्र के ग्रामीणों ने संबंधित विभागों और जिला प्रशासन से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की वर्तमान स्थिति को देखते हुए केवल मरम्मत पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि यह भी पता लगाना जरूरी है कि सड़क किन कारणों से खराब हो रही है और भविष्य में इसे सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें हैं कि पेंड्री-स से बदरा-ब तक निर्मित सड़क का तकनीकी निरीक्षण कराया जाए, निर्माण सामग्री, निर्धारित मोटाई, बेस की मजबूती और कम्पैक्शन की गुणवत्ता की जांच की जाए, सड़क निर्माण से जुड़े गुणवत्ता परीक्षण और कार्य स्वीकृति के रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए तथा सड़क की क्षमता के अनुरूप वाहनों के संचालन को सुनिश्चित किया जाए।
इसके अलावा मार्ग पर संचालित तीनों कोल डिपो की आवश्यक अनुमतियों और संचालन संबंधी दस्तावेजों की जांच, भारी वाहनों के वजन की जांच, ओवरलोडिंग के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई तथा सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत कराने की मांग भी की गई है। ग्रामीण चाहते हैं कि सड़क पर जाम की स्थिति को रोकने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि छोटे वाहन, दोपहिया चालक और पैदल राहगीर सुरक्षित आवागमन कर सकें।
स्थानीय नागरिक मुकेश बारगाह का कहना है कि सड़क की खराब स्थिति का सीधा असर आसपास के गांवों के लोगों के आवागमन पर पड़ रहा है। सड़क के किनारे धंसने और जगह-जगह गड्ढे होने से दोपहिया वाहन चालकों के साथ पैदल चलने वालों को भी परेशानी हो रही है। बारिश के दौरान स्थिति और खराब होने की आशंका रहती है। स्कूली बच्चों, ग्रामीणों, किसानों और मरीजों को आने-जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सड़क पर भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण हादसे का खतरा भी बना रहता है। इस संबंध में ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत भी की है, लेकिन अभी तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है।
अब जांच और जवाबदेही का इंतजार
पेंड्री-स से बदरा-ब तक बनी करीब 10 किलोमीटर लंबी सड़क की मौजूदा स्थिति ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और भारी वाहनों के संचालन की निगरानी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर 5 करोड़ 4 लाख 86 हजार रुपये की लागत से बनी सड़क के किनारे निर्माण के लगभग दो महीने बाद ही खराब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो दूसरी ओर कोयला लोड हाईवा के धंसने और उसे निकालने में करीब 24 घंटे लगने की घटना ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
अब देखना होगा कि संबंधित विभाग सड़क की तकनीकी जांच कराकर निर्माण की गुणवत्ता और सड़क की वर्तमान स्थिति पर क्या निष्कर्ष निकालते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि इस मार्ग से गुजरने वाले भारी वाहनों का वास्तविक भार कितना है और क्या वे सड़क की निर्धारित क्षमता के अनुरूप संचालित हो रहे हैं।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग मामले को गंभीरता से लेते हुए स्थल निरीक्षण, तकनीकी जांच और आवश्यक कार्रवाई करेंगे, ताकि करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क को समय से पहले बर्बाद होने से बचाया जा सके और ग्रामीणों को सुरक्षित एवं सुगम आवागमन की सुविधा मिल सके।






















