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कुछ घटनाओं से पूरे समाज का मूल्यांकन उचित नहीं

समाज, परिवेश, परंपराएँ, सोच और धारणाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं। कुछ बदलाव सकारात्मक होते हैं और समाज को आगे बढ़ाते हैं, जबकि कुछ बदलाव लोगों की सोच को इतना प्रभावित कर देते हैं कि वे बिना सोचे-समझे पूरे वर्ग के बारे में निर्णय लेने लगते हैं।

आज विवाह को लेकर महानगरों, शहरों और गाँवों—हर जगह लड़के-लड़कियों की सोच में बदलाव आया है। पिछले कुछ समय से यह धारणा बहुत तेजी से फैल रही है कि “आजकल की लड़कियाँ पहले जैसी नहीं रहीं। वे अपने अधिकारों का गलत फायदा उठाती हैं, शादी के बाद ज़रा-सी बात पर तलाक लेने को तैयार हो जाती हैं और आर्थिक लाभ चाहती हैं। इसलिए लड़के शादी करने से डरने लगे हैं।

हाल ही में हुई एक दर्दनाक घटना, जिसमें एक नवविवाहिता ने अपने पति की हत्या कर दी, पूरे देश में चर्चा का विषय बनी। यह निस्संदेह एक विकृत मानसिकता का उदाहरण है और ऐसे अपराध की कठोर निंदा होनी चाहिए। लेकिन क्या एक व्यक्ति के अपराध के आधार पर पूरी पीढ़ी या सभी लड़कियों को दोषी ठहरा देना उचित है?

मैं इस सोच से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि मैं भी इसी दौर के बच्चों की माँ हूँ। मेरे आसपास जितने भी युवा हैं—चाहे लड़कियाँ हों या लड़के—अधिकांश जिम्मेदार, संवेदनशील और एक-दूसरे का सम्मान करने वाले हैं। वे रिश्तों को निभाना जानते हैं और परिवार की अहमियत समझते हैं।

कुछ लोगों की विकृत सोच और गलत हरकतों के कारण पूरे समाज, पूरी पीढ़ी या सभी लड़कियों पर उंगली उठाना न केवल अनुचित है, बल्कि उन लाखों अच्छे संस्कारों वाले बच्चों के साथ भी अन्याय है जो ईमानदारी से अपने रिश्ते निभा रहे हैं।
कृपया कुछ घटनाओं को पूरे समाज का चेहरा मत बनाइए। जिस तरह हर लड़का गलत नहीं होता, उसी तरह हर लड़की भी गलत नहीं होती। किसी भी वर्ग का मूल्यांकन कुछ अपवादों से नहीं, बल्कि बहुसंख्यक लोगों के आचरण से होना चाहिए। यही न्याय है, यही परिपक्व सोच है।

विभा सिन्हा, बलौदाबाज़ार

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